वे भारत को क्यों नहीं समझते?
बहुत सारे भारतीय पुनर्जन्म और आत्मा के देहांतरण में विश्वास रखते हैं। हालाँकि यह बौद्धिक रूप से समृद्ध दर्शन है, लेकिन इसका रोजमर्रा का सीधा-सादा अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का दूसरा, तीसरा, चौथा या अनंतवाँ जीवन उसके कर्मों का परिणाम होता है। इस सीधे-सादे पैमाने से देखा जाए तो मैं कम-से-कम अपने पिछले कुछ जन्मों से विदेशी निवेशक अवश्य रहा होऊँगा!
मैंने अपना उद्यमी जीवन 1990 के दशक के आरंभ में शुरू किया। तब से मैं सभी तरह के छोटे-बड़े विदेशी निवेशकों से खुशनुमा माहौल में उद्यम की बात कर चुका हूँ। कोई-न-कोई विदेशी निवेशक हरेक महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर पर बैठा होता है। शुरुआती दिनों में साहसी पूँजीवादी होते थे, जो भारत की 'भ्रमित कर देनेवाली जटिलताओं' से दो-चार होने के लिए आते थे। उनकी भाषा में, मैं 'उपभोक्ता-केंद्रित बिलकुल नए व्यवसाय' में 'संभावित बौद्धिक पूँजी' वाला व्यक्ति था। इस व्यवसाय में 'विस्फोटक वृद्धि होने की संभावना थी, क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का गियर बदल चुका था और उपभोक्ताओं की आकांक्षा जीवन की बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं रह गई थी।' दूसरे शब्दों में, मैं गरीब लेकिन प्रतिभाशाली व्यक्ति था, जिसके पास पूँजी तो नहीं थी, लेकिन मीडिया से संबंधित विशेष कौशल और विचार जरूर थे। मुझमें 'मूल्य' के सृजन की क्षमता थी और देश में टीवी चैनलों का अबाध गति से विस्तार हो रहा था। इस स्थिति में अगर वे मुझे 50 लाख डॉलर नकद और इक्विटी में कुछ हिस्सा देते, जिससे मैं प्रोफेशनलों की एक टीम और एक कंपनी खड़ी करता तो वह 'भारत के नवजात मीडिया उद्योग' की लीडर बन सकती थी। यह अपनी तरह का पहला का विदेशी निवेशक था, जिससे मेरा साबका वर्ष 1993 में पड़ा।
इन निवेशकों की दूरदर्शिता की मैं दाद देना चाहूँगा। यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि उन दिनों यदि मेरे पास 50 लाख डॉलर होते तो मैं उन्हें बिस्तर के नीचे छिपाकर रखता, लेकिन संघर्ष करनेवाले किसी बत्तीस साल के नौजवान को, जिसकी औकात सेकंड हैंड कार खरीदने से ज्यादा नहीं थी, कभी नहीं देता। मगर इन लोगों ने हम पर दाँव लगाया और खूब पैसे कमाए। जैसे-जैसे हमारा कारोबार बढ़ने लगा, हमने बड़े दाँव लगाए और पहले से बड़े निवेशकों के साथ सौदे किए! पहले चरण की उद्यम पूँजी का स्थान बाद के चरण के प्राइवेट इक्विटीवाले लोगों ने ले लिया। उन्होंने मुझे 2 करोड़ डॉलर दिए, लेकिन इक्विटी का एक छोटा हिस्सा ले लिया। इसकी सीधी-सादी वजह यह थी कि 'शुरुआती जोखिम कम हो गया था और हमारे बढ़ते कार्य-कलाप में सफलता की अवधारणा के प्रमाण दिखने लगे थे।' ये लोग हर तीन महीने पर हमारे पास आते थे, बोर्ड की बैठकों में शिरकत करते थे, कुछ फैंसी ग्राफिक्स देखते थे, हमारे महत्त्वपूर्ण लोगों से मिलते थे, हमारे प्रतिष्ठान में सुविधाओं का जायजा लेते थे और डबलिन बार में छककर मदिरापान करते थे। भारत के बारे में उत्साह सदा मंद रहता और उसमें सदा संशय का पुट रखा होता। वे तरह-तरह के सवाल करते थे। मसलन आपकी सरकार मंजूरी देने में इतनी देर क्यों करती है? आपकी विदेशी निवेश नीति इतनी प्रतिबंधी क्यों है? आपके हवाई अड्डे इतनी जर्जर हालत में क्यों हैं? आपके होटल तो इतने बढि़या हैं, लेकिन वहाँ तक जानेवाली सड़कें इतनी टूटी-फूटी क्यों हैं? आप इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेते हैं? आपके देश में इतने अखबार क्यों निकलते हैं? उनमें से इतने अंग्रेजी में क्यों हैं? इतने अखबार आखिर चल कैसे रहे हैं? आप अपने नेताओं का खुलेआम मखौल कैसे उड़ाते हैं? वित्त मंत्री के साथ इतने असहज इंटरव्यू के बाद आपका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया गया? वहाँ मॉल क्यों नहीं हैं? आपके सिनेमा हॉल इतने घटिया क्यों हैं? भारतीय उपभोक्ता सेवाओं के लिए भुगतान क्यों नहीं करते? आदि-आदि।
हर बातचीत थोड़े-बहुत फेर-बदल के साथ एक ही टिप्पणी से खत्म होती थी-''आपको पता है, चीन या कोरिया या थाईलैंड या दुबई ऐसा नहीं है।''
वाणिज्यिक ताकत हासिल कर लेने पर हमारा मनोबल और बाजार में हिस्सा बढ़ गया। हम शेयर पूँजी देनेवाले विदेशी निवेशकों को छोड़कर मूल्य-शृंखला में और ऊपर आ गए। हमने ऐसे विदेशी सहयोगी खिलाडि़यों-यानी बड़े अमेरिकी मीडिया समूहों-से सौदा किया, जो अपने ब्रांड, प्रोग्रामिंग और प्रतिष्ठा को हमारे साथ सौदा करके दाँव पर लगाने को तैयार थे। हमारा पहला संयुक्त उद्यम सीएनबीसी के साथ था। इस करार के फलस्वरूप हमने भारत में चौबीसों घंटे चलनेवाला एक बिजनेस न्यूज चैनल शुरू किया। सारा निवेश हमारा था, हमने सारे जोखिम उठाए और उन्हें रॉयल्टी दी। फिर, हमने भारत में चौबीसों घंटे चलनेवाले एक सामान्य न्यूज चैनल के लिए सीएनएन के साथ करार किया। इसमें भी सारा निवेश हमारा था। सारे जोखिम हमने उठाए और उन्हें रॉयल्टी दी। फिर, हमने वायाकॉम के एमटीवी इंडिया, निकेलोडियन इंडिया और वीएच1 इंडिया सरीखे प्रतिष्ठित ब्रांडों में 50 प्रतिशत की हिस्सेदारी खरीद ली। हमने 10 करोड़ डॉलर से अधिक का निवेश कर एंटरटेनमेंट चैनल 'कलर्स' शुरू किया। इस उद्यम का मुखिया कंपनी के सीईओ को बनाया गया। 'कलर्स' की दर्शनीय सफलता से विदेशी पार्टनर बहुत प्रभावित हुए। हमारे एजेंडा में अगला नाम फोर्ब्स का था। हमने 'फोर्ब्स इंडिया' का प्रकाशन शुरू किया।
पाँच साल से भी कम समय में हमने दुनिया के तमाम अग्रणी मीडिया ब्रांडों को एक भारतीय बैलेंस शीट पर ला दिया। सीएनबीसी, सीएनएन, एमटीवी, निकेलोडियन, वीएच1 और फोर्ब्स सरीखे स्पर्धात्मक अमेरिकी मीडिया समूहों को एक स्वामित्व के मातहत लाने के बारे में किसने सोचा या साहस किया था। मुझसे प्रायः यह सवाल पूछा जाता है, ''आपने यह सब कैसे किया?'' जवाब में मैं कंधे उचका देता हूँ। आखिर मैं लोगों से कैसे कहूँ कि कम-से-कम पिछले कई जन्मों में मैं जरूर विदेशी निवेशक रहा होऊँगा!
पैसे का स्वरूप अब 'वाणिज्यिक' नहीं रह गया था, वह 'स्ट्रेटेजिक' हो गया था। लेकिन आशंकाएँ कभी खत्म नहीं हुई थीं। भारतीय बाजार इतना छोटा क्यों है? भारतीय कानून इतने कमजोर और भ्रामक क्यों हैं? यहाँ बौद्धिक संपदा अधिकार के लिए संरक्षण क्यों नहीं है? भारतीय उपभोक्ता हमारे सिग्नलों को क्यों चुरा लेते हैं? भारतीय अदालतें मामलों के निपटारे में इतना अधिक समय क्यों लेती हैं? भारतीय दर्शक हॉलीवुड की उत्कृष्ट फिल्मों की तुलना में बॉलीवुड की फूहड़ फिल्में क्यों पसंद करते हैं? भारत के राजनीतिक पंडित और राजनेता अपने शब्दों व आलोचनाओं में संयम क्यों नहीं बरतते? आपके देश में अपमान और मानहानि से संबंधित कानून इतने लचर क्यों हैं? हम केवल भारतीय उपग्रहों का ही इस्तेमाल क्यों करते हैं? बार-बार होनेवाले चुनावों के कारण नीतिगत फैसलों को लंबे समय तक क्यों लटकाए रखा जाता है? भारत की नौकरशाही इतनी बुजदिल क्यों है? भारत के बैंकर इतने रूढि़वादी क्यों हैं? ब्याज दरें इतनी ऊँची क्यों हैं? सारी नीतियाँ अंग्रेजी में ही क्यों बनाई जाती हैं? भारतीय इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेते हैं? भारत में कंपनियों की संपन्नता के बावजूद इतनी भयानक गरीबी क्यों है? आप अपने देश में अधिक-से-अधिक डॉलर क्यों नहीं आने देना चाहते? आपने इतना सक्षम पूँजी बाजार कैसे खड़ा किया है? लेकिन आपके देश में बॉण्ड बाजार क्यों नहीं है? आप तेल और केबल टीवी की कीमतों पर नियंत्रण क्यों रखते हैं? सरकार कॉलेजों में जींस पर प्रतिबंध लगाने का विफल प्रयास क्यों कर रही है? आपके सामाजिक क्लबों में पश्चिमी वेशभूषा पर जोर क्यों दिया जाता है? आपकी क्रिकेट लीग में और अधिक विदेशी खिलाडि़यों को शामिल करने की इजाजत क्यों नहीं दी जाती? आपके महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों में इतने बूढ़े राजनीतिज्ञ क्यों हैं?
जाहिर है, ऐसी लगभग हर 'क्यों वाली बातचीत' इस वाक्य से खत्म होती थी-''ओह, लेकिन चीन या कोरिया या थाईलैंड या दुबई में ऐसी बात नहीं है!''
सच कहूँ तो मैं इस भावना से कभी नहीं उबर सका कि निवेशकों के लिए भारत महज एक 'सुरक्षित प्रपत्र' था। वे जहाँ चीन, कोरिया, थाईलैंड और दुबई में भरोसे के साथ बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे थे, वहीं भारत के प्रति उनका रवैया, उन्हीं के शब्दों में, अनुभेद या गौण का था। भारत उनके लिए थोड़ा जटिल और समझ से परे था। इसके बावजूद यहाँ कुछ ऐसी विशेषताएँ थीं, जो उसे किसी दिन आर्थिक महाशक्ति बना सकती थीं। सो, इस देश को न समझते हुए भी वे इसकी उपेक्षा करने का साहस नहीं कर सके। इसकी वजह यह थी कि भारत में रहस्यमय शक्ति थी और वह उनके पोर्टफोलियो में संभावित लाभदायक क्षेत्र या 'बहुविध निवेश' के रूप में जगह पा सकता था। विदेशी निवेशक इतना तो समझते ही थे कि भारत में कुछ पैसा लगाकर दाँव खेलने में हर्ज नहीं है। यदि दाँव सही बैठा तो आप चाँदी काटेंगे, वरना इसे एशिया में दूसरी जगहों पर लगाए गए दाँव को 'बचाने की कीमत' मान लेंगे।
मेरे जेहन में एक सवाल उमड़-घुमड़ रहा था, जिसका मैं जवाब खोज रहा था-क्या ये विदेशी भारत को समझते भी हैं?
मैंने फरवरी 1982 में बाईस साल की उम्र में विदेशी धरती पर पहली बार कदम रखा, वह भी असामान्य परिस्थिति थी। मुझे इलाज के लिए हवाई जहाज से न्यूयॉर्क ले जाया गया। हमारा विमान बर्फीले तूफान से ढके शहर में उतरा। हट्टे-कट्टे परिचारकों ने मेरे स्ट्रेचर को आव्रजन से बाहर निकाला और सायरन बजाती एंबुलेंस में डाल दिया। शहर में हर जगह रोशनी और चमचमाते गलियारे थे। अमेरिकी कार्य-कुशलता से यह मेरा पहला साबका था और विस्मय से मेरी आँखें खुली-की-खुली रह गईं। मैनहट्टन शहर के बीचोबीच जबरदस्त ट्रैफिक था, लेकिन हमने एंबुलेंस के सायरन का पूरा फायदा उठाया। कारें अकल्पनीय अनुशासन दिखाते हुए एंबुलेंस के लिए रास्ता छोड़ देतीं, ताकि वह जल्दी-से-जल्दी अस्पताल पहुँच सके। मुझे अस्पताल में भरती कर लिया गया और एक आरामदायक बिस्तर पर डाल दिया गया। मैंने परिचारकों के सवालों के जवाब देते हुए पूरी शाम गुजारी। मेरे लिए यह सबकुछ बिलकुल नया अनुभव था।
मैंने अगले चार महीने अस्पतालों, क्लीनिकों, होटलों और किराए के घरों में बिताए। मैं गार्डों, हाउसकीपरों, लिफ्ट परिचालकों और नर्सों से बातें किया करता था। वे सब मुसकराते हुए बिना किसी आपत्ति के मुझसे एक ही सवाल करते, ''क्या आप पाकिस्तान से आए हैं?'' भारत का अस्तित्व मानो जन-मानस में कहीं नहीं था। यह वह समय था, जब 'गांधी' ने सारे ऑस्कर बटोर लिये थे। मुझसे प्रायः पूछा जाता, ''क्या सही में ऐेसा कोई व्यक्ति पैदा हुआ था?'' नियमित रूप से पूछा जानेवाला दूसरा सवाल था, ''आप इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोलते हैं? आपका ब्रिटिश लहजा बहुत अच्छा है। क्या आपने लंदन में पढ़ाई की है? क्या हर भारतीय इतनी ही अच्छी अंग्रेजी बोलता है?''
चार महीने बाद मैं दो चीजों का कायल हो गया-अमेरिकी व्यवहार-कुशल हैं, लेकिन भारत उनके राडार पर कहीं नहीं है। यह ताज्जुब की बात थी; क्योंकि गलियों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों में भारतीय भरे पड़े थे। इसके बावजूद- एक राष्ट्र के रूप में या एक वास्तविक, ठोस, पहचान योग्य हस्ती के रूप में-लोग हमें नहीं जानते थे।
पिछले लगभग तीन दशक से एक सवाल मुझे परेशान किए हुए है-आखिर विदेशी निवेशक भारत को क्यों नहीं समझते हैं? वे हमें क्यों नहीं अहमियत देते?
दो साल पहले हमारे अहम विदेशी बैंकरों में से एक ने मुझसे कहा कि ''कॉकटेल पार्टी शुरू होने के पहले मैं किसी ऐसे विषय पर उसके शीर्ष नेतृत्व को संबोधित करूँ, जो सौ बैंकरों को लगभग एक घंटे तक बाँधे रखे।'' उसका बैंक अपने विदेशी बोर्ड और प्रबंध-समिति को सालाना शिखर बैठक के लिए भारत ला रहा था। भारत में उनकी यह पहली बैठक थी। भारत के लिए भी इस तरह का यह पहला मौका था। ये वे लोग थे जो अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अन्य महत्त्वपूर्ण देशों में कारोबार का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें से ज्यादातर लोग पहले भी एशिया आते रहे थे, लेकिन भारत उनके एजेंडे में नहीं होता था। ये लोग और कुछ नहीं, बल्कि मोटा वेतन लेनेवाले अधिकारी थे। मैं आमतौर पर इस तरह के बहुत कम निमंत्रणों को स्वीकार करता हूँ। लेकिन इस मामले में मैं तुरंत राजी हो गया। इसका कारण यह था कि अच्छा उद्यमी अपने बैंकर को 'न' कभी नहीं कहता है। इसके अतिरिक्त मैं इस जमावड़े को प्रयोगशाला मानकर अपने उन सिद्धांतों को परखना चाहता था, जो 'भारत के बारे में उनकी नासमझी' से संबंधित॒थे।
मैं कुछ अधपके विचारों के साथ नई दिल्ली स्थित उस होटल में पहुँचा, जहाँ बैठक होने वाली थी। बैठक में मैंने 40 मिनट तक इधर-उधर की बातें कीं। बीच-बीच में सवाल-जवाब भी होते रहे। इस तरह मैंने अपना सिद्धांत उनके सामने प्रस्तुत किया। मैंने अपनी वार्त्ता का शीर्षक दिया था-'पश्चिमी जगत् भारत को क्यों नहीं समझ पाता है-भारत की राजनीतिक/आर्थिक विरासत का बुनियादी आकलन'
मैंने शुरुआत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से की। भारत की जटिलता को न समझ पाने की पश्चिम की असमर्थता के तत्त्व उसमें मौजूद थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व ऐसे वकीलों के हाथ में था, जो पश्चिम के उदारवादी लोकतांत्रिक परंपरा से ओत-प्रोत थे। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और कई अन्य नेता ऑक्सफोर्ड या कैंब्रिज के छात्र थे। उनकी युवावस्था वहीं गुजरी। उन्होंने नित नए फैशन में कपड़े पहने और बॉण्ड स्ट्रीट पर मिलनेवाले महँगे-से-महँगे सुख-साधनों का उपभोग किया। इसके बावजूद उन्होंने गरीब किसानों और शिल्पकारों के आंदोलन का नेतृत्व किया, कम-से-कम स्वदेश में पश्चिमी सुख-सुविधाओं को छोड़ दिया और 'लाखों भूखे लोगों' की आकांक्षाओं के साथ लगभग पूरी तरह तादात्म्य बिठा लिया। उनका नेतृत्व प्रतीकात्मक या बनावटी नहीं था। उन्होंने कभी दोहरा जीवन नहीं जिया, जो लोगों के बीच सादा लेकिन निजी जीवन में राजसी ठाट-बाटवाला हो। वे बौद्धिक रूप से ईमानदार नेता थे। कथनी और करनी अधिकांशतः मेल खाती थी। उन्होंने सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता पर आधारित सही मायने में लोकतंत्र की स्थापना की। इसमें कोई शक नहीं कि उसमें कुछ गंभीर खामियाँ थीं, क्योंकि उसका जन्म पूर्वग्रहों और ऐतिहासिक दरारों से युक्त दोषपूर्ण समाज में हुआ था।
इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र जिंदा रहा। पश्चिम को इसकी पहली झलक 'अबोधगम्य' भारत के रूप में मिली। एक के बाद एक नव-स्वतंत्र देशों में लोकतंत्र का प्रयोग विफल होता गया। कई नव-स्वतंत्र देशों के शासक तानाशाह बनते जा रहे थे। लेकिन भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व बना रहा, चाहे उसमें जितनी खामियाँ रही हों।
इस वजह से पश्चिम में भारत के प्रति उदासीनता, या यों कहें कि संदेह, पैदा हुआ। जिन लोगों ने भारत के लोकतंत्र को अनिच्छापूर्वक स्वीकार कर लिया, लेकिन उसे समझा नहीं, वे उससे दूर ही रहे। उनका कहना था, ''चूँकि हम भारत के बारे में नहीं जानते, इसलिए उससे दूरी बनाए रखना ही ठीक है।'' दूसरे लोगों का मानना था कि भारत लोकतंत्र का लबादा ओढ़े हुए है, जिसके भीतर एक एकदलीय राष्ट्र छिपा है। इसलिए वे भारत को संदेह के नजरिए से देखते थे और उससे खासी दूरी बनाकर रखते थे। इसका नतीजा यह निकला कि भारत उनसे दूर और अलग होता गया। वह उदासीनता या संदेह की वस्तु बन गया।
भारत ने जब सोवियत शैली का समाजवाद अपनाया तो यह संदेह और भी पुख्ता हो गया। भारत की पहचान पर पहले से उँगली उठानेवाले पश्चिमी नेताओं के लिए अंतर्विरोध अब बिलकुल स्पष्ट था, जिससे उन्हें एक तरह का संतोष मिला। वे कहने लगे, सोवियतों के नक्शे-कदम पर चलनेवाला लोकतंत्र! ओह, मुझे तो माफ करो! ऐसा देश जो समानता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता है, लेकिन अपने उद्यमियों का गला घोंटता है और संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करता है? ऐसे देश से भगवान् बचाए!
सो '50 और '60 के दशक में भारत पश्चिम से अलग-थलग रहा। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोवियत शैली की योजना के खुलेआम प्रशंसक थे। वे लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल करते हुए सरकारी इस्पात संयंत्रों और पनबिजली बाँधों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहते थे। वे अर्थव्यवस्था को सार्वजनिक स्वामित्व में रखने के हिमायती थे। 'आधुनिक भारत के मंदिरों' में से ज्यादातर का निर्माण रूसी टेक्नोलॉजी और रूबल से हुआ था। भारत ने विशिष्ट परिरुद्ध अर्थव्यवस्था का भी निर्माण किया। ऊँचे शुल्क की दीवारें, असंगत मुद्रा विनिमय दरें और औद्योगिक लाइसेंसिंग के जरिए विदेशी उद्योगों के प्रवेश में रुकावटें इसकी मिसाल हैं। निजी उपक्रम बरबाद हो गए और उद्यमशीलता वस्तुतः खत्म हो गई। देश में एक विशाल गैर-कानूनी या काली अर्थव्यवस्था फूलने-फलने लगी। इन सबके बीच भारत के राजनीतिक नेता क्रेमलिन में अधिकारियों के साथ फोटो खिंचवाकर गर्व महसूस कर रहे थे। 'वामपंथ की तरफ झुकाव और कम्युनिस्ट-पूजा' की भारत की यह छवि पश्चिमी मानस में गहरे पैठ गई और एक प्राचीन तथा सामंती समाज को परेशान करनेवाले लोकतांत्रिक सुधार की भारी खुराक निष्प्रभावी हो गई।
नेहरू के मातहत भारत का यह विरोधाभास था। उन्होंने अर्थव्यवस्था पर राज्य के कड़े नियंत्रण के सुस्पष्ट प्रतीकों की रचना की। साथ ही, उन्होंने लोकतंत्र और परिवर्तन की शक्तियों को खुली छूट दी, जो पश्चिम के लोगों को सुखद लगनी चाहिए थी। '50 के दशक में, जब तमाम नवस्वतंत्र राष्ट्र एकदलीय शासन की ओर बढ़ रहे थे, तब भारत में वयस्क मताधिकार, किसी भी लिंग या जाति के नागरिकों के लिए समान मौलिक अधिकार, वास्तविक निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र प्रेस, सही मायने में स्वायत्त न्यायपालिका, हलचलपूर्ण मनोरंजन एवं सूचना समाज, मजबूत अंग्रेजी-भाषी मध्य वर्ग, उच्च गुणवत्तावाली तकनीकी एवं शैक्षिक अवसंरचना और उदार विचारों की संस्कृति की नींव पुख्ता हो रही थी। लेकिन पश्चिम इस विरोधाभास को नहीं समझ सका। वामपंथ की तरफ भारत का झुकाव स्पष्ट रूप से काला पक्ष था, जबकि उसका लोकतांत्रिक प्रयास चटक उजला पक्ष था। लेकिन परिणामस्वरूप उपजा धूम्र वर्ण पश्चिम की समझ से बाहर था। दूसरी तरफ, काले रंग को समझना और साम्यवाद को निशाना बनाना आसान था। और चूँकि तमाम प्रतिबंधोंवाला भारत पश्चिम की पूँजी के लिए फायदेमंद नहीं था, इसलिए यहाँ निवेश करना समझदारी का काम नहीं समझा गया। पश्चिम ने भारत की जरा भी परवाह न करते हुए उसे अकेला छोड़ दिया।
'50 के दशक की विमुखता '60 और '70 के दशकों की कड़वाहट में बदल गई। भारत को दो लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं-सन् 1962 में चीन से और 1965 में पाकिस्तान से। इन लड़ाइयों ने भारत को सोवियत संघ की तरफ और अधिक धकेल दिया। भारत ने रूस-निर्मित टैंकों और मिग-25 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया। दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने अमेरिका-निर्मित पैटन टैंकों और एफ-14 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया। एक मायने में यह अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परोक्ष युद्ध था। भारत के प्रति पश्चिम की उदासीनता या संदेह का स्थान अब वैर-भाव लेने लगा था।
सन् 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु होने के दो वर्ष बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी, जो जनवादी और वामपंथी रुझान की थीं, प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, बहुत कम आय करों में लगभग 100 प्रतिशत की वृद्धि कर दी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आधे से अधिक के विनिवेश के लिए मजबूर कर दिया, 1971 में बँगलादेश को आजाद कराने के लिए पाकिस्तान से एक और लड़ाई लड़ी, हेनरी किसिंजर को झुँझलाकर जवाब दिया और राष्ट्रपति निक्सन की तरफ उग्र दृष्टि से देखा, हिंद महासागर में 42वें बेड़े को अमेरिकी धौंस कहा, महासचिव लिओनिद ब्रेझनेव के प्रति स्पष्ट झुकाव दिखाया, परमाणु परीक्षण किया और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में दक्षिण-समर्थक/अमेरिका-विरोधी रवैया अपनाया। भारत ने पश्चिम के सामने साबित कर दिया कि वह क्या है। वह वस्तुतः आग्रही राष्ट्र था। सो, पश्चिम के सामने दो ही विकल्प थे-या तो भारत को पूरा सम्मान दें या फिर उसका विरोध करें।
संयोग से, '60 और '70 के दशकों ने देश में उदारवादी लोकतंत्र को फूलते-फलते देखा। राजनीतिक विपक्ष विश्वसनीय बल के रूप में उठा और 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार को अपदस्थ कर दिया। आजादी के लगभग तीस वर्षों बाद पहली बार एक पार्टी का वर्चस्व खत्म हुआ था। प्रांतीय स्तर पर एक कारगर द्वि-दलीय प्रणाली उभरी और हर पाँच साल पर सरकार बदलने लगी। मध्य वर्ग में नई राजनीतिक चेतना जागी। आजाद प्रेस इंदिरा गांधी के अल्पकालिक, विफल 'इमरजेंसी शासन' के अत्याचार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। भारतीय सिनेमा धड़ल्ले से 'बोल्ड' विषय-वस्तुओं को अपनाने लगा। रूढि़वादी समाज में सेक्स से संबंधित वर्जनाएँ टूटने लगीं और उपभोक्ता-प्रवृत्ति बढ़ने लगी। सामान्य भारतीय खिलाड़ी, फिल्मी सितारे, लेखक, अंतरिक्ष-यात्री नए नायक बन गए और लोकप्रियता में राजनीतिक नेताओं को पीछे छोड़ने लगे। देश बड़ी संख्या में कुशल डॉक्टर, इंजीनियर और ऊँची योग्यतावाले अन्य प्रोफेशनल पैदा करने लगा। 'आप्रवासी भारतीयों' का एक नया समृद्ध वर्ग आश्चर्यजनक रूप से उभरा। इस वर्ग की बौद्धिक क्षमता का अमेरिका और यूरोप में सम्मान किया गया। इन सबके बावजूद पश्चिमी जगत् भारत को नहीं समझ सका। वह भारत की लौह प्राचीर पर आकर रुक गया और उभरते हुए शहरी समाज को नहीं देख पाया। यह शहरी समाज उतना ही आजाद, मुखर और बहुविध पसंदवाला था जितना कि पश्चिमी समाज।
फिर नई संभावनाओं के साथ '80 का दशक आया। अब प्रधानमंत्री की गद्दी के लिए इंदिरा गांधी के बेटे और जवाहरलाल नेहरू के नाती राजीव गांधी की बारी थी। वह अपनी माँ की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार हो गए। उन्हें संसद् में चार-पंचम बहुमत मिला। इतना विशाल बहुमत उनके नाना या उनकी माँ को भी कभी नहीं मिला था। वह चालीस साल के युवा, कमर्शियल पायलट थे, आधुनिक टेक्नोलॉजी के पैरोकार थे। वह कंप्यूटर और दूरसंचार के चैंपियन बन गए। उन्होंने कुछ दकियानूसी समाजवादी कानूनों में ढील देकर ऐसे माहौल की रचना की, जिसमें प्राइवेट उद्यम फिर फूल-फल सकें।
शेयर की कीमतें बढ़ने के साथ देश के शेयर बाजार में पहली बार उछाल आया। राजीव गांधी ने पश्चिम के लिए दरवाजे भी खोले। उनकी इतालवी पत्नी इस प्रयास में स्वभावतः उपयोगी सिद्ध हुईं। कुछ भी हो, सोवियतों का प्रभाव घट रहा था। अंततः ऐसा लगा कि भारत पश्चिम की तरफ अपनी बाँहें फैला रहा है और जवाब में पश्चिम भी दशकों पुरानी उदासीनता, संशय और कड़वाहट को भूल रहा है। लेकिन यह मरीचिका साबित हुई। एक बार फिर भारत और पश्चिम के बीच आपसी विश्वास पैदा नहीं हुआ। राजीव गांधी का शासन भ्रष्टाचार के आरोपों और राजनीति की दुरभिसंधियों के मकड़जाल में उलझ गया। वे सन् 1989 में सत्ता गँवा बैठे और पश्चिम के साथ भारत का अल्पकालिक मनुहार समाप्त हो गया।
सन् 1989 में निर्वाचित सरकार अल्पायु साबित हुई। वह बहुत कुख्यात भी थी। उसने घटिया राजनीति करते हुए जातीय संघर्ष और सांप्रदायिक टकराव को बढ़ावा दिया। अंतरराष्ट्रीय जगत् भी संकट का सामना कर रहा था। कुवैत पर हमला हुआ, तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं और भारत अपनी राजनीति तथा अर्थव्यवस्था के गड़बड़झाले में उलझा रहा। फिर, 1989 की सरकार का स्थान एक दूसरे घटिया गठजोड़ ने लिया, जो और अधिक अवसरवादी व अदूरदर्शी साबित हुआ। देश पहली बार अपने अंतरराष्ट्रीय कर्ज को न चुका पाने के कगार पर आ गया। लिहाजा, उसे अपना सोने का भंडार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास गिरवी रखना पड़ा। सत्ता में आया दूसरा गठजोड़ भी ध्वस्त हो गया और भारत को दो साल के भीतर ही मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा।
लेकिन देश की किस्मत में कुछ और ही लिखा था। राजीव गांधी दोबारा सत्ता में आने का सपना देख रहे थे। लेकिन चुनाव-प्रचार के मध्य में ही उनकी हत्या हो गई। कांग्रेस एक बार फिर सहानुभूति की लहर पर सवार होकर बुजुर्ग राजनीतिक सिपाही पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में चुनाव जीत गई।
तिहत्तर वर्षीय नरसिंह राव युवा राजीव गांधी के उत्तराधिकारी बने। वह देश के वित्तीय संकट से अच्छी तरह वाकिफ थे। इस संकट के कारण उनकी सरकार गंभीर मुसीबत में पड़ सकती थी, यहाँ तक कि गिर भी सकती थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने अत्यंत कर्मठ डॉ. मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री नियुक्त किया। डॉ. सिंह अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने सरकार में वर्षों बिताए थे। वे '80 के दशक में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रहे थे। राव ने सिंह से स्पष्ट कहा था-भारत को गर्त में जाने से बचाओ। भारत को दिवालिया होने से बचाओ।
डॉ. सिंह ने सतर्कता से अपने कदम बढ़ाने शुरू किए। जून 1991 में उन्होंने रुपए का भारी अवमूल्यन कर दिया। भारत के भीरु मानकों को देखते हुए यह एक साहसी और अचरज भरा कदम था। फिर, उन्होंने नीतियों में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। औद्योगिक लाइसेंसिंग को खत्म कर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बेच दिए गए। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फैक्टरी लगाने और कारोबार करने की इजाजत दे दी गई। मुद्रा को लगभग परिवर्तनीय बना दिया गया। शेयर बाजारों को विदेशी पूँजी के लिए खोल दिया गया, जिससे उनमें उछाल आ गया। भारत में उत्साह का माहौल दिखने लगा। इस पुस्तक के लेखक सहित पहली पीढ़ी के सैकड़ों उद्यमियों को अपना कौशल दिखाने और नए उपक्रम शुरू करने के लिए लाखों इक्विटी डॉलर जुटाने का मौका मिला। उपग्रह टेलीविजन ने मध्य वर्गीय भारतीय घरों में बेरोक-टोक पश्चिमी उपभोक्तावाद की तसवीरें दिखानी शुरू कर दीं। लोगों की आकांक्षाएँ बढ़ने लगीं। उपभोक्ता ऋण आसानी से उपलब्ध होने लगा। फैंसी कारें, मोबाइल फोन और प्राइवेट एयरलाइंस सपना नहीं रहीं। भारत की प्रतिष्ठित टेक्नोलॉजी फर्में नैस्डैक (हृ्नस्ष्ठ्नक्त) में सूचीबद्ध हो गईं। पुराने, भारी-भरकम, पारिवारिक स्वामित्ववाले कारोबार उद्यमशीलता की नई ऊर्जा के नीचे दफन हो गए। बचे हुए उद्यमियों को मजबूरन अपने कार्य-कलाप और रवैए में परिवर्तन लाना पड़ा, क्योंकि शहरी भारत दशकों पुरानी समाजवादी जंजीरों से मुक्त हो गया था।
अब पश्चिम ने भी भारत की तरफ गौर करना शुरू कर दिया। कड़वाहट दूर हो गई, संशय नियंत्रित हो गया। लेकिन उदासीनता थोड़ी-बहुत बनी हुई थी। उत्साह अब भी पूरी तरह नहीं जगा था। इसके कारण भी थे। मसलन, भारत में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई थी। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह को सन् 1996 के चुनाव में अपदस्थ कर दिया गया। लेकिन संतोष की बात यही रही कि सत्ता में आनेवाली नई गठबंधन सरकार पश्चगामी नहीं थी। पर यह अस्थिर थी। कुछ महीनों के भीतर एक गुमनाम प्रधानमंत्री की जगह दूसरे कमजोर प्रधानमंत्री ने ले ली। भारत के खुलते हुए आर्थिक परिदृश्य पर नजर रखनेवाले पश्चिम का संशय यहाँ के कमजोर शासन के बारे में बना रहा। दूसरा कारण यह था कि पश्चिमी जगत् चीन, ब्राजील और रूस-खासकर चीन-के बारे में अधिक उत्साह दिखा रहा था। दरअसल चीन उस समय विस्फोटक विकास की नई कहानी रच रहा था।
बीसवीं सदी के अंत में भारत की यही स्थिति थी। दशकों तक अगोचर रहने के बाद इसने किसी तरह पश्चिम के राडार पर अपना बिंब भेजना शुरू कर दिया। लेकिन चीन अब भी पश्चिम का लाडला बना हुआ था। बहरहाल, प्रयोग के तौर पर भारत में पश्चिमी पूँजी का एक छोटा हिस्सा निवेश किया गया। लेकिन यह चीन में होनेवाले निवेश की तुलना में कुछ भी नहीं था। मुझे अब भी याद है कि मेरे प्रख्यात विदेशी निवेशक मित्रों में से एक ने उस समय क्या कहा था। उसने कहा था, ''चीन का विकास दर्शनीय है। वह बेमिसाल हॉकी स्टिक है। वहाँ महज दो साल के भीतर माँग जोर पकड़ने लगती है-माँग चाहे कार की हो या इंटरनेट कनेक्शन की हो या फिर रेफ्रिजरेटर की हो। आप लोग बहुत ढीले-ढाले हैं। विकास के नाम पर आपके देश में कुछ नहीं दिखता। आपके विकास का ग्राफ वर्षों तक एक जगह स्थिर रहता है और जब आप हतोत्साहित होने लगते हैं तो वह थोड़ा ऊपर चढ़ जाता है। उपभोक्ता के रूप में आप इन आदतों को बदलने में वर्षों क्यों लेते हैं? कम दाम देने में आप इतने निर्मम क्यों हैं? आप किसी चीज के बारे में फैसला करने में बहुत लंबा समय क्यों लगाते हैं?
तब से लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी भारत पश्चिम में अपनी पुख्ता पहचान बनाने के लिए संघर्ष करता रहा, या फिर शायद पश्चिम ही भारत की जटिलता को समझने के लिए संघर्ष करता रहा। और चूँकि चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था की खुशनुमा तसवीर पेश की थी, इसलिए भी भारत के विकास के स्थिर ग्राफ को समझने की कोशिश नहीं की गई। भारत के अस्थिर राज्य-तंत्र को देखते हुए यह कल्पना करना मुश्किल नहीं था कि पश्चिम ने बीसवीं सदी के खत्म होने तक भी उस पर ध्यान क्यों नहीं दिया।
लेकिन वर्ष 1999 भारत के लिए रूपांतरण का वर्ष साबित हुआ। अंततः उसे टिकाऊ सरकार मिली। यह एक-दलीय शासन था; लेकिन देश की राजनीति दो गठबंधनों के इर्दगिर्द घूम रही थी। संसद् में 60 प्रतिशत से अधिक के बहुमत के साथ सत्ता में आनेवाले समूह को मध्य से दक्षिण की ओर उन्मुख कहा जा सकता था, जबकि विपक्ष की जगह उन पार्टियों ने ली, जिनका झुकाव वामपंथ की तरफ था। लेकिन वामपंथी झुकाव के बावजूद ये पार्टियाँ मुक्त बाजार की हिमायती थीं। भारत के रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, कंजर्वेटिव और लेबराइट राजनीतिक आकार ग्रहण कर रहे थे। पश्चिम के लिए अब खुश होने और भारत की ओर नई ऊर्जा से देखने का समय था। देश पर अस्थिर संसद् के रूप में लगा सवालिया निशान धीरे-धीरे धुलने लगा और अनिच्छापूर्वक ही सही, द्वि-दलीय प्रणाली ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। भारत के साथ पश्चिम का दिखावटी प्रेम अब सचमुच रोमांस में बदल सकता था।
लेकिन, भारत एक बार फिर इस मामले में बदकिस्मत साबित हुआ। दक्षिणपंथी सरकार ने पच्चीस वर्षों के बाद देश का दूसरा परमाणु परीक्षण किया। इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। बमुश्किल एक साल बाद दुनिया के बाजार डॉट कॉम कंपनियों के औंधे मुँह गिरे शेयरों के बोझ तले दब गए। वर्ष 2001 में 9/11 ने तो पूरे विश्व को हिला दिया। पूरी दुनिया थर्रा उठी। अफगानिस्तान पर बम गिराए गए। दक्षिण एशिया में पश्चिमी धन का प्रवाह रुक गया।
एक बार फिर भारत की स्थिति उस दुलहन की तरह हो गई, जो सज-धजकर अपने दूल्हे का इंतजार करती है, लेकिन भयभीत दूल्हा उसके पास नहीं आता है।
सन् 2003 तक प्रेम-भाव फिर पनपने लगा। 9/11 के घाव भर रहे थे। भारत की स्थूल अर्थव्यवस्था ने पश्चिम को लुभाना शुरू कर दिया। निम्न मुद्रास्फीति, कर और ब्याज दरों के कारण घरेलू खपत में उछाल आ गया। शेयर बाजारों में भी तेजी आने लगी। निवेश की माँग, खासकर मध्य वर्गीय आवास योजनाओं में, बढ़ने लगी। ऊर्जा से लबरेज शहरी भारत में धड़ाधड़ मॉल खुलने लगे, कारों और महँगी वस्तुओं की माँग जोर पकड़ने लगी। सेलफोन के उपभोक्ताओं की संख्या में अचानक बढ़ोतरी होने लगी। शहरी भारत इस स्थिति से आनंदित था। सन् 2004 में केंद्र में वामपंथी झुकाववाली नई सरकार सत्तारूढ़ हुई। उसके मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह थे। ये वही मनमोहन सिंह थे, जिन्होंने सन् 1991 में अकादमिक वित्त मंत्री के रूप में भारत की आर्थिक क्रांति की शुरुआत की थी। उनके वित्त मंत्री एक हार्वर्ड-प्रशिक्षित वकील थे, जो सात साल पहले दूसरी सरकार में टैक्स घटाकर कॉरपोरेट भारत के दुलारे बन गए थे। देश में विदेशी पूँजी का आना शुरू हो गया। शेयर बाजार पहले दुगुना, फिर तीन गुना उछला। सन् 2005 में सकल घरेलू उत्पाद में भी 9 प्रतिशत का उछाल आया। भारत अंततोगत्वा उड़ान भरने लगा। और इस बार पश्चिम जश्न में शामिल होने के लिए इच्छुक था। वह भारत से हाथ मिलाने के लिए अंततः तैयार था।
मैं अपनी बात कहते हुए रुक गया। मेरे श्रोताओं, यानी दुनिया भर में घूमनेवाले बैंकरों, का पूरा ध्यान मेरी तरफ था। मैं 40 मिनट से बोल रहा था। 8॒बजे शाम की मंद हवा हौले-हौले सहलाकर ताजगी का एहसास करा रही थी। बार खुला हुआ था। मैं श्रोताओं के खाँसने की उम्मीद कर रहा था, जिसका अर्थ यह होता कि मैं अब अपना भाषण खत्म करूँ और कॉकटेल की चुस्की लूँ। लेकिन बिन पूछे सवालों से माहौल गंभीर दिख रहा था। मैं ड्रिंक की जरूरत महसूस कर रहा था। इसलिए अब अपनी बात खत्म करने का समय था।
मैंने उपसंहार करते हुए कहा, ''भारत के लिए अब महज एक शिकन बची है, जिसे दूर करने की जरूरत है। भारत को चीन जितना अभी भी आकर्षक नहीं समझा जाता। इसकी वजह यह है कि भारत के नीति-निर्माता बुजदिल हैं और दशकों के समाजवाद से जकड़े हुए हैं। वे जोखिम उठाना नहीं चाहते और दूसरों की तुलना में भारत के बारे में अल्पानुमान करते हैं। एक तरफ तो युवा भारत आत्मविश्वास से लबरेज है, उद्यमी भारत नियंत्रणों से मुक्त हो रहा है और विदेशी निवेशक उसके बारे में उत्साही हैं। लेकिन उसके अपने ही नीति-निर्माताओं को कोई चिंता नहीं है। उन्हें दरअसल उत्साह दिखाने की जरूरत है। अपने देश के बारे में वही भरोसा दिखाने की जरूरत है, जो दूसरे दिखाते हैं। जिस दिन ऐसा होगा, अंतिम शिकन भी खत्म हो जाएगी और भारत यदि चीन से अधिक नहीं तो कम-से-कम उसके जितना आकर्षक जरूर बन जाएगा।'' मैंने हाथ हिलाते हुए अपना भाषण खत्म किया। यह शारीरिक भाषा में संकेत था कि मैंने विजयोल्लास में उपसंहार किया।
तालियाँ कम बजीं। श्रोताओं ने मेरे भाषण को बहुत ध्यान से सुना था। फिर उन्होंने तालियाँ बजाकर उत्साह क्यों नहीं दिखाया? वे अब भी विचारों में खोए हुए दिखे। ज्यादातर श्रोता उठ खड़े हुए और धीमे, पर उत्साह से बात करते हुए बार की तरफ बढ़ गए। जाहिर है, मैंने उन्हें कुछ अंतर्दर्शन, कुछ आत्मविश्लेषण और शायद प्रचुर अविश्वास तथा कुछ असहमति के लिए भी प्रेरित किया था।
मैं डिनर के लिए मुख्य टेबल पर बैठ गया। ग्लोबल सीईओ ने मेरा हाथ दबाया और 'तकलीफ के लिए धन्यवाद' दिया। उसने मुझे इशारों में 'आँखें खोलने वाली वार्त्ता' के लिए बधाई दी (इसके सिवाय वह कह भी क्या सकता था?)। फिर, जैसे कुछ सोचने के बाद उसने पूछा, ''तो किताब कब आ रही है? आप यह सब कब प्रकाशित करने जा रहे हैं? आपकी किताब बेस्टसेलर साबित होगी।'' जवाब में मैं कुछ निरर्थक शब्द बुदबुदाया। फिर अपनी वाइन उठाई, एक बड़ा सा घूँट लिया और जायकेदार खाने का आनंद लेने में व्यस्त हो गया।
यह सन् 2005 की बात है। अगले दो वर्षों में भारत प्रगति की राह पर तेजी से चल पड़ा। अर्थव्यवस्था 9 प्रतिशत की दर से बढ़ने लगी, बाजारों में फिर उछाल आ गया और चारों ओर खुशनुमा माहौल दिखने लगा। जहाँ चीन में अब भी भारी निवेश हो रहा था, वहीं कम-से-कम कुछेक विदेशी स्वरों ने कहना शुरू कर दिया कि 'लोकतांत्रिक भारत विकास के मामले में चीन को पछाड़ देगा।' ये आवाजें अपवाद थीं। लेकिन भारत कम-से-कम खेल में शामिल हो गया था। इस खेल से केवल भारत के राजनेता बाहर थे। गोल्फ की भाषा में कहें तो वे अभी भी बंकरों को हिट कर रहे थे।
यदि मैं अपने पिछले कई जन्मों में विदेशी निवेशक था तो उससे पहले के कम-से-कम दो अन्य जन्मों में प्रशासनिक अधिकारी जरूर रहा होऊँगा। इसकी वजह यह है कि जब से मैं उद्यमी बना हूँ, विदेशी निवेशकों के बाद सरकारी नीति-निर्माताओं और अफसरशाहों ने मेरी जन्म-कुंडली को अपनी मुट्ठी में रखा है। जरा कल्पना कीजिए, योजनाओं की मंजूरी के लिए उनके पास कितनी बार दौड़ना पड़ता है-विदेशी निवेश लाने के लिए, रॉयल्टी के रूप में डॉलर का भुगतान करने के लिए, विदेशी कंपनियों को खरीदने के लिए, उपग्रह सिग्नल को अपलिंक करने के लिए, संयुक्त उद्यम के भागीदारों को बोर्ड के अधिकार देने के लिए, शेयर बाजार में कंपनी को सूचीबद्ध कराने के लिए, अपने ही शेयरधारकों को हक के रूप में शेयरों की पेशकश करने के लिए, कर्मचारियों को बोनस देने के लिए...सूची वस्तुतः अंतहीन है। भारत में उद्यमियों को कुछेक हफ्ते बाद प्रशासनिक अधिकारियों के सामने बैठना पड़ता है और मंजूरी के लिए चिरौरी करनी पड़ती है। यह सच्चाई है, चाहे आप इसे पसंद करें या न करें।
भारतीय प्रशासनिक अधिकारी बहुत समझदार होता है। वह देश में सबसे अधिक बुद्धिमान लोगों में गिना जाता है। वह चीजों को आसानी से समझ लेता है। वह आमतौर पर मुखर और सुगम होता है। वह किसी समस्या की गहराई में जा सकता है और उसका समाधान बता सकता है। लेकिन वह काम करने में प्रायः टाल-मटोल करता है। उसे गिलास को आधा खाली देखने का प्रशिक्षण मिला होता है, आधा भरा होने का नहीं। उसकी प्रवृत्ति फैसले को टालने की होती है, न कि फैसला लेने की। वह 'मध्य मार्ग' पर चलने में विश्वास करता है। वह तनिक भी विवादास्पद, नया या साहसी कदम उठाने से बचता है। वह 'अपनी चमड़ी बचाने' के लिए 'सर्वसम्मति' या 'विमर्श' का रास्ता अपनाता है। उसका तकिया कलाम होता है-''सरकारी फैसले परिणामोन्मुखी नहीं, प्रक्रियात्मक होते हैं।'' इसमें कोई शक नहीं कि कुछ साहसी अधिकारी भी होते हैं, जो हवा के रुख के विपरीत चलते हैं, नए काम करते हैं और जोखिम उठाते हैं। लेकिन ऐसे अधिकारी 'आमतौर पर' अकर्मण्यता की हद तक सावधानी बरतते हैं।
इस मिसाल को लीजिए-कई साल पहले सरकार ने एक साहसी नीतिगत परिवर्तन किया। इसके तहत भारतीय कंपनियों को अपने कुल मूल्य की दोगुनी विदेशी मुद्रा स्वतः बाहर भेजने की छूट मिल गई। यदि आपके पास नकदी और अपनी 'नेट वर्थ' के बारे में ऑडिटर का सर्टिफिकेट हो तो आपको अपने बैंक के पास जाकर केवल यह कहना था कि वह अनुबंधवाली पार्टी को डॉलर भेज दे। यह नाटकीय परिवर्तन था। इसके पहले विदेशी मुद्रा के लेन-देन पर इतनी कड़ी निगरानी रखी जाती थी कि 1 डॉलर बाहर भेजने के लिए भी दर्जन भर मंजूरियाँ लेने की जरूरत पड़ती थी। हमारी जैसी कंपनियों ने इस नीतिगत परिवर्तन के कारण राहत की साँस ली। हमने सोचा कि अब हम आजाद हैं; लेकिन जब एक सरकारी बैंक ने नए नियम पर विश्वास करने से इनकार कर दिया तो आप कल्पना नहीं कर सकते हैं कि हमें कितना आश्चर्य हुआ होगा। बैंक के चेयरमैन के पास जाकर मैंने बात की। उन्हें अंग्रेजी में स्पष्ट लिखा हुआ नया नियम भी दिखाया। चेयरमैन ने सिर हिलाते हुए कहा, ''मैं आपसे सहमत हूँ, बहल साहब। कानून में निश्चित रूप से यह लिखा हुआ दिखता है कि मंजूरी की जरूरत नहीं है। लेकिन मैं इस पर कैसे विश्वास करूँ? यह कानून रातोरात इतना उदार कैसे हो गया? यह गलती से छप गया होगा। मैं इसे नहीं मान सकता। इस पर भारतीय रिजर्व बैंक की राय लूँगा।'' मैंने जो कुछ सुना, मुझे उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। एक वरिष्ठ और अनुभवी बैंकर को अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं था। वह यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि दुनिया बदल गई है। हाँ, वह यह मानने के लिए जरूर तैयार था कि सरकार ने गलत नीति प्रकाशित करवाई होगी। यह निराशाजनक था, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता था। मामला रिजर्व बैंक को भेजा गया। रिजर्व बैंक ने जवाब में चेयरमैन की खिल्ली उड़ाते हुए लिखा-'क्या आप नए दिशा-निर्देशों को नहीं पढ़ सकते? अब से हमारे पास इस तरह के मामलों को भेजने की जरूरत नहीं है।'
जब मैं रिजर्व बैंक के आदेश के साथ चेयरमैन से मिला तो उनका चेहरा लाल हो गया।
एक और मिसाल लें-2000 के दशक के शुरू में सरकार ने समाचार प्रसारण कंपनियों के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में परिवर्तन कर दिया। संशोधित नियम के तहत विदेशी कंपनियाँ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अधिकतम 26 प्रतिशत शेयर खरीद सकती थीं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या 'परोक्ष विदेशी शेयर' की परिभाषा में खड़ी हो गई। हमने सरकार से विनम्रतापूर्वक कहा कि हमारे शेयरधारक हर मिनट में बदलते हैं, क्योंकि हम पब्लिकली ट्रेडेड कंपनी हैं। इसलिए 'परोक्ष विदेशी शेयर' का यह पूरा कारोबार 'शुरू से ही अनिर्धारणीय' है। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो कोई व्यक्ति 'परोक्ष विदेशी शेयर' की पूँजी की मात्रा को कभी 'प्रमाणित' नहीं कर सकता। इसके दो कारण हैं-पहला, शेयरधारकों का कोई निश्चित रजिस्टर नहीं होता; दूसरा, अगर रजिस्टर होता भी है तो आप नहीं जान सकते कि उस शेयरधारक की बैलेंस शीट में कितनी विदेशी इक्विटी है। मेरा खयाल था कि हमारे तर्क पूरी तरह से आम समझ पर आधारित हैं, इसलिए तुरंत स्वीकार कर लिये जाएँगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस सिद्धांत को नीति की शक्ल लेने में लगभग आठ वर्ष लग गए।
लेकिन यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अधिकतर नियामक सुलभ, विनम्र और समझदार हैं। मैं यह बात ईमानदारी से कह रहा हूँ। वे मुद्दों को अच्छी तरह समझते हैं। इसके अतिरिक्त, वे यह भी जानते हैं कि विलंब से कितना नुकसान होता है। लेकिन बदकिस्मती से, वे कड़ी प्रक्रियाओं से पूरी तरह बँधे हुए हैं। सो, उनमें से कइयों ने निजी तौर पर कहा, ''आप हमारे पास आए ही क्यों? लेकिन जब आप आ ही गए हैं तो एक बात समझ लीजिए-हम दोनों के सामने कुछ परेशानियाँ हैं। आपको तुरंत फैसला चाहिए। लेकिन मुझे कम-से-कम आधा दर्जन मंत्रालयों से मशविरा करना होगा, तभी मैं बता पाऊँगा कि आपकी कार्रवाई सही है।'
अब दिन-प्रतिदिन हजारों सरकारी दफ्तरों में लाखों सामान्य उद्यमियों और नागरिकों के साथ, पर नियमानुकूल नहीं, होनेवाले खिलवाड़ के बारे में कल्पना कीजिए। समय की इस अकारण बरबादी और विलंब से कितनी खीज होती है!
'सुरक्षित खेल खेलने' की इस प्रवृत्ति का और अधिक नुकसानदायक प्रभाव पड़ता है। इससे आत्मविश्वास में कमी आती है। यह हमारी अंतरात्मा में घुसपैठ करता है, जिससे महत्त्वाकांक्षा घटने लगती है, खुद की क्षमता पर अविश्वास होने लगता है और हीन भावना पैदा होने लगती है। भारत के नीति-निर्माता निश्चित रूप से चीन के बारे में इसी तरह महसूस करते हैं। किसी भारतीय राजनेता या प्रशासनिक अधिकारी के सामने भारत और चीन की तुलना कीजिए। उन्हें चीन की लंबी छलाँग के बारे में बताइए, कई मामलों में चीन के मुकाबले भारत के पिछड़ेपन को दिखाइए, चीन की दूरदर्शिता, साहस और नीतियों के कार्यान्वयन की प्रशंसा कीजिए। फिर देखिए कि वे किस तरह बचाव पर उतर आते हैं। वे कहेंगे, ''मेरे दोस्त, आपके लिए चीन की प्रशंसा करना आसान है। लेकिन याद रखिए, उन्हें संसद् का सामना नहीं करना पड़ता है। उन्हें हर पाँच साल पर चुनाव का सामना नहीं करना पड़ता है। वे थिअनानमेन चौक पर टैंक भेजकर सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की सामूहिक हत्या कर सकते हैं। यहाँ हम हत्यारों और डाकुओं तक को फाँसी पर नहीं लटका सकते, उलटे उन्हें मंत्री बना देते हैं।'' जब आप उन्हें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इजराइल, जापान और अन्य लोकतांत्रिक देशों की मिसाल देंगे कि उन्होंने किस तरह तमाम 'बाधाओं' को दूर किया और चीन से कहीं अधिक तरक्की की, तो रक्षात्मक भारतीय नीति-निर्माता जवाब देंगे, ''मित्र, आप अर्थहीन तुलना कर रहे हैं। वे संपन्न देश हैं। क्या आप कभी भारत के गाँवों में गए हैं? क्या आपने कभी भयंकर गरीबी देखी है? ज्यादातर भारतीय प्रतिदिन 1 डॉलर से भी कम पर गुजारा करते हैं।'' फिर वे निराशा में हाथ खड़े कर देंगे। उनके चेहरे पर बहस जीतने का आत्मविश्वास झलकेगा। आखिर भारत की गरीबी उसे गरीब रखने का पर्याप्त कारण जो है।
मुझसे प्रायः एक सवाल पूछा जाता रहा है, ''आप एक बड़ी भारतीय कंपनी के मालिक हैं। आपके खयाल से भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम क्या है?'' इस सवाल का जवाब मैंने सदा बेहिचक दिया है। भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम केवल एक है। वह यह कि यहाँ के राजनेताओं को उसकी क्षमताओं और नियति पर भरोसा नहीं है। दूसरी हर अक्षमता इसी बीमारी से पैदा हुई है, जिससे हमारे नीति-निर्माता ग्रस्त हैं। वे हर भारतीय को विदेशियों के मुकाबले कमतर मानते हैं। वे भारत को बोझ तले दबे रहने के लिए मजबूर करते हैं। वे समाज के ऊपरी तबके में रहकर संतुष्ट हैं। उन्हें इस बात पर कभी भरोसा नहीं होता कि भारत में वह सबकुछ है, जो उसे शीर्ष पर बैठा सकता है, न कि शीर्ष के करीब ले जा सकता है। वे छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही खुश हो जाते हैं और जश्न मनाते हैं। उन्हें लगता है कि भारत शीर्ष पर नहीं पहुँच सकता। वे जोखिम उठाने से इतना डरते हैं कि युवा भारत की आकांक्षाओं के विपरीत उसे पीछे की ओर ढकेलते हैं। वे इस बात को समझने की कोशिश नहीं करते कि युवा भारत का धैर्य चुक रहा है।
मैं कोई अकादमिक व्यक्ति नहीं हूँ और न ही अर्थशास्त्री या नीति-निर्माता हूँ। मैं महज एक संपादक और उद्यमी हूँ। यह पुस्तक, जिसे मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ, सहज वृत्ति, अंतर्बोध और अनुभव का परिणाम है। आज भारत के लिए अपने को बदलने और वह सबकुछ करने का अवसर है, जो चीन ने किया है। यानी वह अपने लाखों लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से निकाल सकता है। भारत और चीन के बीच मुकाबला बराबरी का है। चीनी खरगोश और भारतीय कछुए के बीच यह आश्चर्यजनक दौड़ है। इस दौड़ में चीन को चिंता करने की जरूरत नहीं है। दूसरी तरफ, भारत को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह हारेगा ही।
-राघव बहल
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राघव बहल भारत के सबसे बड़े समाचार और व्यवसाय नेटवर्क 'नेटवर्क 18' के संस्थापक, नियामक-भागीदार और संपादक हैं, जो देश में सीएनएन व सीएनबीसी का प्रसारण करता है। 'नेटवर्क 18' सुप्रसिद्ध पत्रिका 'फोर्ब्स इंडिया' का प्रकाशन भी करता है। बहल एनबीसी यूनीवर्सल, वायकॉम, टाइम वार्नर और फोर्ब्स सरीखी विशाल मीडिया कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने में सफल रहे हैं। 17 साल की अल्पावधि में 'नेटवर्क 18' ने करीब 3,500 करोड़ रुपए की बाजार पूँजी हासिल की है।
Emperor Sher Shah Suri is the father of India's roads-he built the Grand Trunk Road 450 years ago.
It spanned the breadth of India from current-day Bangladesh to Pakistan. At every 6 km was a sarai or rest place for caravans. Centuries later, Adam Smith would call roads 'the greatest of all improvements', but Sher Shah Suri had figured it all out for himself.
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'इस पुस्तक में भू-राजनीति के उभरते दौर में भारत और चीन की भूमिका का अनूठा तथा आकर्षक विवरण है।'
— आनंद शर्मा, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, भारत सरकार |
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