पूर्वावलोकन

वे भारत को क्यों नहीं समझते?


बहुत सारे भारतीय पुनर्जन्म और आत्मा के देहांतरण में विश्वास रखते हैं। हालाँकि यह बौद्धिक रूप से समृद्ध दर्शन है, लेकिन इसका रोजमर्रा का सीधा-सादा अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का दूसरा, तीसरा, चौथा या अनंतवाँ जीवन उसके कर्मों का परिणाम होता है। इस सीधे-सादे पैमाने से देखा जाए तो मैं कम-से-कम अपने पिछले कुछ जन्मों से विदेशी निवेशक अवश्य रहा होऊँगा!

मैंने अपना उद्यमी जीवन 1990 के दशक के आरंभ में शुरू किया। तब से मैं सभी तरह के छोटे-बड़े विदेशी निवेशकों से खुशनुमा माहौल में उद्यम की बात कर चुका हूँ। कोई-न-कोई विदेशी निवेशक हरेक महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर पर बैठा होता है। शुरुआती दिनों में साहसी पूँजीवादी होते थे, जो भारत की 'भ्रमित कर देनेवाली जटिलताओं' से दो-चार होने के लिए आते थे। उनकी भाषा में, मैं 'उपभोक्ता-केंद्रित बिलकुल नए व्यवसाय' में 'संभावित बौद्धिक पूँजी' वाला व्यक्ति था। इस व्यवसाय में 'विस्फोटक वृद्धि होने की संभावना थी, क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का गियर बदल चुका था और उपभोक्ताओं की आकांक्षा जीवन की बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं रह गई थी।' दूसरे शब्दों में, मैं गरीब लेकिन प्रतिभाशाली व्यक्ति था, जिसके पास पूँजी तो नहीं थी, लेकिन मीडिया से संबंधित विशेष कौशल और विचार जरूर थे। मुझमें 'मूल्य' के सृजन की क्षमता थी और देश में टीवी चैनलों का अबाध गति से विस्तार हो रहा था। इस स्थिति में अगर वे मुझे 50 लाख डॉलर नकद और इक्विटी में कुछ हिस्सा देते, जिससे मैं प्रोफेशनलों की एक टीम और एक कंपनी खड़ी करता तो वह 'भारत के नवजात मीडिया उद्योग' की लीडर बन सकती थी। यह अपनी तरह का पहला का विदेशी निवेशक था, जिससे मेरा साबका वर्ष 1993 में पड़ा।

इन निवेशकों की दूरदर्शिता की मैं दाद देना चाहूँगा। यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि उन दिनों यदि मेरे पास 50 लाख डॉलर होते तो मैं उन्हें बिस्तर के नीचे छिपाकर रखता, लेकिन संघर्ष करनेवाले किसी बत्तीस साल के नौजवान को, जिसकी औकात सेकंड हैंड कार खरीदने से ज्यादा नहीं थी, कभी नहीं देता। मगर इन लोगों ने हम पर दाँव लगाया और खूब पैसे कमाए। जैसे-जैसे हमारा कारोबार बढ़ने लगा, हमने बड़े दाँव लगाए और पहले से बड़े निवेशकों के साथ सौदे किए! पहले चरण की उद्यम पूँजी का स्थान बाद के चरण के प्राइवेट इक्विटीवाले लोगों ने ले लिया। उन्होंने मुझे 2 करोड़ डॉलर दिए, लेकिन इक्विटी का एक छोटा हिस्सा ले लिया। इसकी सीधी-सादी वजह यह थी कि 'शुरुआती जोखिम कम हो गया था और हमारे बढ़ते कार्य-कलाप में सफलता की अवधारणा के प्रमाण दिखने लगे थे।' ये लोग हर तीन महीने पर हमारे पास आते थे, बोर्ड की बैठकों में शिरकत करते थे, कुछ फैंसी ग्राफिक्स देखते थे, हमारे महत्त्वपूर्ण लोगों से मिलते थे, हमारे प्रतिष्ठान में सुविधाओं का जायजा लेते थे और डबलिन बार में छककर मदिरापान करते थे। भारत के बारे में उत्साह सदा मंद रहता और उसमें सदा संशय का पुट रखा होता। वे तरह-तरह के सवाल करते थे। मसलन आपकी सरकार मंजूरी देने में इतनी देर क्यों करती है? आपकी विदेशी निवेश नीति इतनी प्रतिबंधी क्यों है? आपके हवाई अड्डे इतनी जर्जर हालत में क्यों हैं? आपके होटल तो इतने बढि़या हैं, लेकिन वहाँ तक जानेवाली सड़कें इतनी टूटी-फूटी क्यों हैं? आप इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेते हैं? आपके देश में इतने अखबार क्यों निकलते हैं? उनमें से इतने अंग्रेजी में क्यों हैं? इतने अखबार आखिर चल कैसे रहे हैं? आप अपने नेताओं का खुलेआम मखौल कैसे उड़ाते हैं? वित्त मंत्री के साथ इतने असहज इंटरव्यू के बाद आपका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया गया? वहाँ मॉल क्यों नहीं हैं? आपके सिनेमा हॉल इतने घटिया क्यों हैं? भारतीय उपभोक्ता सेवाओं के लिए भुगतान क्यों नहीं करते? आदि-आदि।

हर बातचीत थोड़े-बहुत फेर-बदल के साथ एक ही टिप्पणी से खत्म होती थी-''आपको पता है, चीन या कोरिया या थाईलैंड या दुबई ऐसा नहीं है।''

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राघव बहल भारत के सबसे बड़े समाचार और व्यवसाय नेटवर्क 'नेटवर्क 18' के संस्थापक, नियामक-भागीदार और संपादक हैं, जो देश में सीएनएन व सीएनबीसी का प्रसारण करता है। 'नेटवर्क 18' सुप्रसिद्ध पत्रिका 'फोर्ब्स इंडिया' का प्रकाशन भी करता है। बहल एनबीसी यूनीवर्सल, वायकॉम, टाइम वार्नर और फोर्ब्स सरीखी विशाल मीडिया कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने में सफल रहे हैं। 17 साल की अल्पावधि में 'नेटवर्क 18' ने करीब 3,500 करोड़ रुपए की बाजार पूँजी हासिल की है।

चीन विकास के क्षेत्र में अपनी गति से अर्थशास्त्र के चकित करनेवाले नए मुहावरे गढ़ रहा है; जबकि भारत उभरती अर्थव्यवस्था का विशिष्ट उदाहरण है। भारत के विकास की गति में धीमी किंतु निरंतर वृद्धि हुई है।
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It spanned the breadth of India from current-day Bangladesh to Pakistan. At every 6 km was a sarai or rest place for caravans. Centuries later, Adam Smith would call roads 'the greatest of all improvements', but Sher Shah Suri had figured it all out for himself.

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