अनुमोदन
सुपर पावर पर जानी मानी हस्तियों की राय
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'इस पुस्तक में भू-राजनीति के उभरते दौर में भारत और चीन की भूमिका का
अनूठा तथा आकर्षक विवरण है।'
— आनंद शर्मा, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, भारत सरकार |
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'उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत को अंततः
‘लोकतंत्र, जनसांख्यिकी और विविधता’ का लाभ मिलेगा।'
— मुकेश डी. अंबानी, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड |
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'अनूठी शैली में अपूर्व अंतर्दृष्टि के साथ भारत और चीन के इतिहास
एवं क्षमताओं का आँकड़ों से परिपूर्ण चित्रण।'
— एन.आर. नारायण मूर्ति, संस्थापक व चीफ मेंटर, इंफोसिस |
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'इक्कीसवीं सदी की उभरती शक्ति के रूप में भारत की समस्याओं और संभावनाओं में दिलचस्पी रखनेवाले हर व्यक्ति के लिए पठनीय।'
— बिमल जालान, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर |
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'आज दुनिया के दो सबसे चर्चित राष्ट्र भारत व चीन की वर्तमान और ऐतिहासिक घटनाओं के
आधार पर आर्थिक स्थिति, राज्यतंत्र और समाज की तुलना एवं विवेचना।'
-सुनील भारती मित्तल, चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक, भारती एंटरप्राइजेज |
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'दो दिग्गज राष्ट्रों की क्षमताओं और चुनौतियों की अंतर्दृष्टिपूर्ण तुलना।
भारत बनाम चीन की पहेली को समझने के लिए एक पठनीय पुस्तक।'
— आनंद जी. महिंद्रा, उपाध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा |
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'राघव पत्रकार और उद्यमी के रूप में इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति की चर्चा में
अपने परिप्रेक्ष्य को अनूठे अंदाज में रखते हैं।'
— के.वी. कामथ, चेयरमैन, पूर्व एमडी और सीईओ, आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड |
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'जहाँ चीन के उत्थान के पीछे एक सबल शासन-तंत्र है, वहीं भारत धीरे-धीरे,
सशक्त शासन-तंत्र के अभाव में, अस्त-व्यस्त तरीके से आगे बढ़ रहा है;
परंतु भारत के विकास का रास्ता अधिक सुनिश्चित है।'
— गुरचरण दास, प्रसिद्ध लेखक व मैनेजमेंट गुरु |
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'राघव बहल का यह वर्णन रोचक है। इसमें दो खास बातें हैं- पहली, आज की वास्तविकता को बताने के लिए इतिहास की बेहतर समझ और दूसरी तुलनात्मक विश्लेषण की गहरी समझ।'
— तरुण खन्ना, जॉर्ज पाउलो लेमन प्रोफेसर, हार्वर्ड बिजनस स्कूल और बिलियंस ऑफ एंटरप्रेनर: हाऊ चाइना एंड इंडिया आर रीशेपिंग देयर फ्यूचर एंड योर्स के लेखक। |
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'इतिहास, जनसांख्यिकी, अर्थव्यवस्था और समाज से संबंधित मुद्दों का
भारत में रह रहे एक भारतीय द्वारा बहुआयामी विश्लेषण।'
— रमा बीजापुरकर, उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ |
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